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                                रु-ब-रू ज़रा बाहर झाँक कर क्या देखा ,  हम खुदबखुद शरीफ़ नज़र आने लगे ।
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अनुरक्ति एक कठपुतली सी हु मैं तेरे हाथों की , तेरे ईशारों पर चलना मुझें आज भी अच्छा लगता हैं ।